(इसके पाठ करने से सम्पूर्ण रामायण के पाठ का फल मिलता है।)
गोस्वामी श्री तुलसीदास कृत श्री संक्षिप्त रामचरित मानस
दोहा
बंदऊँ पद धरि धरनि सिरू बिनय करउँ कर जोरिI
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरिII
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।।
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।।
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।।
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।।
कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।।
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।।
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखसीला।।
दोहा
बहुरि कहहु करूनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।
पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि
ग्यानी।।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।।
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।।
जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।।
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।।
हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाएII
श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।
दोहा
नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।
आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज।।
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।
जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस।।
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।
देखि परम पावन तव आश्रमI गयउ मोह
संसय नाना भ्रम।।
अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।।
सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।।
सुनत गरूड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।
भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।।
पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई I तब सिसु चरित कहेसि मन लाईII
दोहा
बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह।
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाहII
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।।
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।।
बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।
सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।।
करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।
पुनि रघुपति बहुबिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।
भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरू अत्रि भेंट पुनि बरनी।।
दोहा
कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।
बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग।।
कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।
पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।।
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।।
खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।
दसकंधर मारीच बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।।
पुनि माया सीता कर हरना। श्री रघुवीर बिरह कछु बरना।।
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति
दीन्ही।।
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।
दोहा
प्रभु नारद संबाद कहि मारूति मिलन प्रसंग।
पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।।
कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास।
बरनन बर्षा सरद अरू राम रोष कपि त्रास।।
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।
बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।
सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।।
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि
दीन्हा।।
बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।।
आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही की कुसल सुनाई।।
सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।।
मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।
दोहा
सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार।
गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार।।
निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिधि प्रकार।
कुंभकरन घननाद कर बल पौरूष संघार।।
निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।
रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका।।
सीता रघुपति मिलन बहोरीI सुरन्ह कीन्हि
अस्तुति कर जोरी।।
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।
जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।।
कहेसि बहोरी राम अभिषेका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।
कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।।
सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।।
सोरठा
गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित।
भयउ राम पद नेह तब प्रसाद बायस तिलक।।
मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि।
चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन।।
एक श्लोकि रामायण
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं,
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् ।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं,
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्।।
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